Saturday, October 12, 2019

Salasar Balaji Rajasthan Travel Guide In Hindi.

सालासर बालाजी स्थान
सालासर शहर राजस्थान में चूरू जिले का एक हिस्सा है और यह जयपुर बीकानेर  राजमार्ग पर स्थित है। यह सीकर से 57 किलोमीटर, सुजानगढ़ से 26 किलोमीटर, रतनगढ़ से 50 किलोमीटर और लक्ष्मणगढ़ से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। सालासर शहर सुजानगढ़ पंचायत समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है


सालासर बालाजी मंदिर का महत्व

भगवान हनुमानजी को समर्पित भारत में यह एकमात्र बालाजी का मंदिर है जिसमे बालाजी के दाढ़ी और मूँछ है। बाकि चेहरे पर सिंदूर चढ़ा हुआ है। पूर्णिमा के दिन यहां आने वाले सभी भक्तों की मुरादें पुरी होती हैं। लोग मंदिर में स्थित एक प्राचीन वृक्ष पर नारियल बांध कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की अभिलाषा करते है।

सालासर कैसे पहुंचे ?
सड़क मार्ग द्वारा

दिल्ली से दैनिक बस सेवाएं डीटीसी, हरियाणा रोडवेज और राजस्थान रोडवेज द्वारा संचालित की जाती हैं।सरकारी बस का किराया रु.207/- है। निजी बस का किराया रु.500 /- से रु.550 /- है।


जयपुर से सालासर बस द्वारा
जयपुर से सालासर के लिए राजस्थान सरकार और निजी कंपनी की बसे जाती है।RSRTC एक्सप्रेस बस का किराया - रु.169 /- और सेमि डीलक्स का किराया रु.184 /- है।निजी ट्रेवल्स का किराया रु.200 /- से 600 /- है।


बीकानेर और अन्य पड़ोसी शहरों से सालासर पहुंच सकते हैं, जो राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम द्वारा संचालित नियमित बस सेवा से अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं।

रेल मार्ग द्वारा
सालासर जाने के लिए सीधे रेल सुविधा नहीं है।
सालसर के नजदीकी रेलवे स्टेशन
सुजानगढ़ 26 कि.मी., रतनगढ़ 50 कि.मी., सीकर 55 कि.मी., डीडवाना 43 कि.मी., लक्ष्मणगढ़ 33 कि.मी., जयपुर 175 कि.मी.सुजानगढ़ और रतनगढ़ स्टेशन पर उतरकर सालासर जाना सबसे आसान है।

दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरों से सुजानगढ़ ,रतनगढ़ और जयपुर के लिए सीधे रेल सेवा उपलब्ध है।सुजानगढ़ ,रतनगढ़ और जयपुर से बस या टैक्सी द्वारा सालासर आसानी से पंहुचा जा सकता है।

हवाई मार्ग द्वारा
सालासर का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जयपुर है।जयपुर से कार किराए पर ले सकते हैं या राजस्थान रोडवेज बस के माध्यम से सालासर जा सकते हैं। जयपुर से सालासर की दूरी लगभग 210 किमी है। सालासर पहुंचने में लगभग 3.5 घंटे का समय लगता है।


सालासर की यात्रा कितने दिन की होगी - 1 दिन
सालासर में कितने दिन निवास करे - 1 दिन

सालासर बालाजी कोनसे दिन भारी भीड़ होती है 

श्री हनुमान जयंती पर मेला और अक्टूबर में शरद पूर्णिमा का मेला, इसके अलावा, होली, दिवाली और विजयादशमी के अवसर पर एक विशाल मेला आयोजित किया जाता है। सप्ताह में मंगलवार, शनिवार और रविवार और प्रत्येक पूर्णिमा के दिन श्री बालाजी भगवान के दर्शन के लिए भक्तो की भारी भीड़ उमड़ती है।

पेड़ पर नारियल बांधने का रिवाज

सालासर बालाजी मंदिर में एक प्राचीन वृक्ष पर नारियल को मोली से बांधना इस मंदिर का सबसे प्रसिद्ध रिवाज़ है जो बडी़ संख्या में भक्तों द्वारा किया जाता है। माना जाता है कि यदि कोई भक्त नारियल को पूर्ण विश्वास से पेड़ पर बांधता है तो उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती है।

सालासर बालाजी धर्मशाला नाम और पत्ते

सालासर बालाजी की कथा
राजस्थान सीकर के रुल्याणी गांव के निवासी लछीरामजी पाटोदिया के सबसे छोटे पुत्र मोहनदास बचपन से ही श्री बालाजी भगवान के भक्त थे। हर पल बालाजी के सतसंग और पूजन-अर्चन में लगे रहते थे। मोहनदासजी की बहन कान्ही का विवाह सालासर गांव में हुआ था।कुछ महीनो के बाद कान्ही ने उदय नामक एक पुत्र को जन्म दिया। पुत्र उदय के जन्म के कुछ समय पश्चात् ही उसके पति की मृत्य हो गई। मोहनदास जी अपनी बहन कान्ही और भांजे का खेती में हाथ बटाने के लिए सालासर आकर उनके साथ रहने लगे। उनकी मेहनत से कान्ही के खेत सोना उगलने लगे।

दिन बीतते गए मोहनदासजी जी रात दिन बालाजी के भक्ति में लीन रहने लगे।लोग उन्हें बावलिया कहने लगे। कान्ही ने सोचा कि मोहनदास का विवाह करवा देते हैं, फिर सब ठीक हो जाएगा। यह बात मोहनदास को पता चली तो उन्होंने कहा कि जिस कन्या से मेरे विवाह की बात चलाओगी, उस कन्या की मृत्यु हो जाएगी। और सच में ऐसा ही हुआ। जिस कन्या से मोहनदास के विवाह की बात चल रही थी, उस कन्या की अचानक मृत्यु हो गई। तब से मोहनदास जी ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और बालाजी के भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करने लगे।


एक दिन शनिवार को एक चमत्कार हुआ। नागपुर जिले में असोटा गाँव का एक जाट किसान अपने खेत को जोत रहा था। एकाएक हल का फल किसी वस्तु से टकराया। उसने खोदकर देखा तो वहां मिट्टी में सनी हुई मूर्ति मिलीं। उसकी पत्नी उसके लिए भोजन लेकर वहाँ पहुँची। किसान ने अपनी पत्नी को मूर्त्ति दिखायी। उन्होंने अपनी साड़ी से मूर्त्ति को साफ़ कीया। मूर्ति की मिट्टी साफ की तो वहां श्रीहनुमानजी की दिव्य मूर्ति के दर्शन हुए।यह मूर्त्ति बालाजी भगवान श्री हनुमानजी की थी।भगवान बालाजी के प्रकट होने का यह समाचार तुरन्त असोटा गाँव में फ़ैल गया। असोटा के ठाकुर ने भी यह खबर सुनी। बालाजी ने उसके सपने में आकर उसे आदेश दिया कि इस मूर्त्ति को चूरू जिले में सालासर में स्थापित कर दिया जाए। उसी रात मोहन दासजी महाराज ने भी अपने सपने में भगवान हनुमान यानि बालाजी को देखा। भगवान बालाजी ने उनको असोटा की मूर्त्ति के बारे में बताया। सुबह ठाकुर व अनेक ग्रामवासियों ने मोहनदास जी के साथ मूर्ति का स्वागत किया और शुक्ल नवमी को शनिवार के दिन पूर्ण विधि-विधान से हनुमान जी की मूर्ति की सालासर में स्थापना की गई।इसी जगह को आज सालासर धाम के रूप में जाना जाता है।







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