Saturday, August 3, 2019

Sabarimala Temple Keral travel guide and Mandal Vratam In HIndi

सबरीमाला मंडल व्रत के नियम और विधि
केरल के सबरीमाला अयप्पा मंदिर में मनाई जाने वाली मंडला पूजा एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। अय्यप्पा भक्त जो सबरीमाला मंदिर जाना चाहते हैं, वे व्रतम का पालन करते हैं। भक्त 41 दिनों का व्रत रखते है। मंडल व्रतम का मुख्य उद्देश्य मन और आत्मा को शुद्ध करना है।मंडल व्रत की शुरुवात मलयालम महीने वरिकम में शुरू होता है और धनू महीने के मध्य
में समाप्त होता है।मंडला पूजा का दिन 41 दिनों की तपस्या के अंत का प्रतीक है जो भगवान अयप्पा के  भक्तों द्वारा रखा  जाता है।भक्त तुलसी या रुद्राक्ष माला पहनकर व्रत शुरू करते हैं।जब तक कि उनकी तीर्थयात्रा पूरी नहीं हो जाती व्रत रखने वाले पुरुष भक्त को अय्यपन स्वामी और महिला भक्त को मालिकपुरम संबोधित किया जाता है। भक्त केवल काले रंग के कपड़े ही पहनते है।
१.व्रत रखने वाले व्यक्ति को दिन में दो बार स्नान करना चाहिए।
२.केवल शाकाहारी भोजन का ही सेवन करना चाहिए।

३.व्रत के अवधि के दौरान सख्त ब्रह्मचर्य का पालन किया जाना चाहिए।
४.व्रत के दिनों में ध्यान और पूजा पाठ करना चाहिए।
५.फिल्मों और TV ,मनोरंजन कार्यक्रम देखने से बचना चाहिए जो कामुक आनंद को आमंत्रित करता है।
६.किसी से भी हिंसा और बहस नहीं करनी चाहिए।
७.मन को शांत रखना चाहिए रखे और सरल जीवन जिए।
८.चप्पल या जूता न पहने सदा नंगे पैर रहे।छाता का उपयोग नहीं करे।९.मंदिर में जाकर या घर में भगवान् अयप्पा स्वामी की पूजा करनी चाहिए।
१०.शराब, तम्बाकू, चबाने वाली सुपारी से नियमित परहेज करे।
११.भक्त अपने शरीर के किसी भी हिस्से पर अपने बालों को नहीं काटेंगे और न ही उनके नाखूनों को काटेंगे।
१२.भक्त दिन में दो बार स्नान करेगा, यदि संभव हो तो रोजाना, कम से कम 108 अयप्पन शरणम का जाप करके पूजा करें।
१३.भक्त मौखिक या शारीरिक रूप से किसी को चोट नहीं पहुंचाएगा।
१४.भक्त के व्रत का पालन करने से परिवार के किसी भी सदस्य को असुविधा नहीं होनी चाहिए।
१५.अपनी पत्नी सहित सभी महिलाओं के साथ मातृ भावना का व्यवहार करेगा।
१६.भक्त अपने बालों में तेल नहीं लगाएगा और अपने शरीर पर तेल से सना हुआ स्नान नहीं करेगा।
१७.भक्त किसी भी सामाजिक समारोह जैसे जन्मदिन, सगाई और शादी आदि में शामिल नहीं होगा और किसी के घर में दावत नहीं लेगा, जिसने व्रत नहीं किया हो।
१८.भक्त मृत शरीर के सान्निध्य में रहने से बचे और गलती से मृत शरीर को देख लेता है तो स्नान करने के बाद ही भोजन करे।
१९.भक्त हमेशा अपने साथ एक तुलसी का पत्ता रखे ताकि बुरी भावना से बच सके।
२०.भक्त बिस्तर पर नहीं बल्कि फर्श पर सोएगा, वह तकिया का उपयोग नहीं करेगा, लेकिन लकड़ी के ब्लॉक का उपयोग कर सकता है।
२१.वह पूरी तरह से भगवान अयप्पा के सामने आत्मसमर्पण कर देगा।

ट्रेन से सबरीमाला कैसे पहुंचे?

सबरीमाला से अन्य शहरों को जोड़ने वाली कोई सीधी रेलवे लाइन नहीं है। सबरीमाला के निकटतम रेलवे स्टेशन कोट्टायम, तिरुवल्ला और चेंगानुर हैं।जो सबरीमाला से लगभग 90 किलोमीटर दूर हैं। मंगलापुरम, बैंगलोर, कोयम्बटूर, हैदराबाद, मुंबई और दिल्ली जैसे केरल के बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए, कोट्टायम रेलवे स्टेशन पर उतरना सबसे सुविधाजनक है।कन्याकुमारी और तिरुवंतपुरम से आने वाले यात्री को चेंगानुर रेलवे स्टेशन पर उतरना सुविधाजनक रहता है। अगर आपके शहर से एर्नाकुलम पहुचेत है तो वहाँसे दूसरी ट्रैन से कोट्टायम पहुंचना पड़ता है। 


हवाई मार्ग से सबरीमाला कैसे पहुंचे?
निकटतम हवाई अड्डे कोच्चि और तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं। हवाई मार्ग से कोच्चि पहुंचने वाले तीर्थयात्रियों को लगभग 160 किमी और तिरुवनंतपुरम जाने वाले लोगों को मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग से लगभग 175 किमी की यात्रा कर सबरीमाला पहुंचना पड़ता है।

सड़क मार्ग से सबरीमाला कैसे पहुंचे?
कर्नाटक राज्य-
मैगलोर या मैसूर से आनेवाले भक्त को पहले केरल के त्रिशूर शहर आना पड़ेगा इसके बाद वे मोवट्टुपुझा-कोट्टायम मार्ग से सबरीमाला पहुंच सकते हैं। त्रिशूर से सबरीमाला दुरी लगभग 210 किलोमीटर है।
तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश -
तमिलनाडु या आंध्रप्रदेश से आने वाले भक्त कोईमतुर या गुड्डालोर से होकर त्रिशूर पहुंच सकते हैं। मदुरै से आने वाले भक्त कुमाली मार्ग से सबरीमाला तक आ सकते हैं। मदुरै से सबरीमाला की दुरी लगभग 250 किलोमीटर है।कन्याकुमारी ,नागरकोइल से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए तिरुवनंतपुरम - कोट्टारक्कारा और अदूर के रास्ते सबरीमाला पहुंच सकते है। सबरीमाला नागरकोइल से लगभग 250 किलोमीटर की दूरी पर है।
तमिलनाडु के चेंकोटा से आने वाले तीर्थयात्री पुनालूर आ सकते हैं और रानी और एरेली के रास्ते सबरीमाला पहुंच सकते हैं। एर्नाकुलम से सड़क मार्ग से आने वाले तीर्थयात्री कोट्टायम से कंजिराप्पल्ली-एरुमेली - वैकोम-एट्टूमनूर मार्ग से सबरीमाला पहुंच सकते है।

भगवान अयप्पा स्वामी पौराणिक कथा
भगवान।  अयप्पा स्वामी की कथा समुद्र मंथन से अमृत के प्याले से जुड़ी है। जिसे पीने के लिए देवताओं और असुरों में विवाद उत्पन्न हो गया था। विष्णु पुराण की कथा के अनुसार एक बार देवराज इन्द्र अपनी किसी यात्रा से स्वर्गलोक वापस लौट रहे थे और उसी समय दुर्वासा ऋषि स्वर्ग से बाहर निकल रहे थे। दुर्वासा ऋषि ने ऐरावत हाथी में बैठे इन्द्रदेव को देखा तो उन्हें भ्रम हुआ कि हाथी सवार व्यक्ति विष्णु भगवान हैं।दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र को विष्णु भगवान् समझकर फूलों की एक माला भेंट की लेकिन अपने अंहकार में डूबे देवराज इन्द्र वह माला अपने हाथी ऐरावत के सिर पर फेंक दी और ऐरावत हाथी ने माला पैरों तले कुचल दी। 
इन्द्र द्वारा किये गए इस अपमान के बाद दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र को श्रीहीन होने का श्राप दे डाला। ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कारन देवता दैत्यों से युद्ध हार गए और दैत्यों ने स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया। देवताओ का स्वर्ग से अधिकार छीन लिया गया।स्वर्ग का राज्य फिर से पाने के लिए सभी देवता इंद्रदेव के साथ भगवान् विष्णु के पास पहुचे और इस समस्या का समाधान पूछा। तब विष्णु भगवान् ने देवताओं को समुद्र मंथन कर स्वर्ग का राज्य वापस पाने और मंथन से निकलने वाले अमृत को देवताओ को  पिलाने का रास्ता सुझाया।

समुद्र मंथन अकेले देवताओं के बस की बात नहीं थी उन्हें इसमें दैत्यों को भी शामिल करना पड़ा। देवताओ ने दानवो के साथ मिल कर समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन से चौदा रत्न निकले। चौदा रत्न में से एक धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये। धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को दैत्यों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी कि वे दैत्यों से लड़कर उस अमृत को ले सकें तब भगवान विष्णु तत्काल मोहिनी रूप धारण कर आपस में लड़ते दैत्यों के पास जा पहुँचे। जब दैत्यों ने उस नवयौवना सुन्दरी को अपनी ओर आते हुये देखा तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुन्दरी की ओर कामासक्त होकर एकटक देखने लगे। दैत्य उनके कटाक्ष से ऐसे मदहोश हुये कि अमृत पीना ही भूल गये।

उसके बाद विष्णुरूपी मोहिनी ने दैत्यों को अपने कटाक्ष से मदहोश करते हुये देवताओं को अमृतपान कराने लगे। भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार देखने लगे। भगवान शिव उनके सौंदर्य पर मुग्ध हो गए।विष्णु भगवान् का मोहिनी रूप देखकर भगवान शिव का वीर्यपात हो गया था। उनके वीर्य को पारद कहा गया और उनके वीर्य से ही स्वामी अयप्पा भगवान् का जन्म हुवा। शिवजी और विष्णु भगवान् से उत्पन होने के कारण उनको 'हरिहरपुत्र' भी कहा जाता है। इनके अलावा भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है।


2 comments:

  1. सिर्फ व्रत करने वाले व्यक्ति ही दर्शन करने जा सकते है? ऐसे कोई साधारण व्यक्ति जिसने कोई भी व्रत नहीं रखा हो क्या वो दर्शन नहीं कर सकत है ??

    ReplyDelete
  2. व्रत रखना आवश्यक नहीं है। कोई भी व्यक्ति व्रत रखे बिना दर्शन के लिए जा सकता है। सिर्फ वह 18 सीढिया सर पर प्रसाद की पोटली (irumudikettu) के बिना चढ़ कर जा नहीं सकता।

    ReplyDelete

Thank you for comment