Sunday, May 12, 2019

Muktinath Nepal Complete Travel Guide In Hindi

मुक्तिनाथ मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय
सितंबर, अक्टूबर और नवंबर

यह नेपाल में पीक सीजन है, न तो बहुत ठंडा और न ही बहुत गर्म। मौसम साफ रहता है। नीले आकाश में बर्फ से ढके पहाड़ों के शानदार दृश्य दिखाई देते है। 
मार्च, अप्रैल और मई
तापमान सामान्य रहता है। नेपाल का राष्ट्रीय फूल रोडोडेंड्रोन (hododendrons) इस मौसम में पूरी तरह से खिलता है और पहाड़ के दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखते हैं।

निम्न माह में मुक्तिनाथ यात्रा करना कठिन और खतरनाक होता है।
जून, जुलाई और अगस्त
पहाड़ी इलाका होने के कारन भारी बारिश होती है।बड़ी पैमाने पर भूस्खलन होता है।सड़क मार्ग से मुक्तिनाथ का जाना खतरनाक और कठिन होता है।
दिसंबर, जनवरी और फरवरी
सर्दी का मौसम होने के कारन मुक्तिनाथ क्षेत्र में भारी बर्फ बारी होती है। यह क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है।
मुक्तिनाथ यात्रा कितने दिन की होगी - 5 दिन (भारत नेपाल बॉर्डर से बॉर्डर तक )



मुक्तिनाथ यात्रा की योजना
पहला दिन -
भारत नेपाल बॉर्डर से पोखरा तक सड़क मार्ग से पहुंचे। पोखरा में रात में रुके। पोखरा में अच्छे होटल झील के किनारे स्थित हैं। पोखरा में दर्शनीय स्थलों को भेट दे - फेवा झील,बाराही मंदिर , विंध्यवासिनी मंदिर, देवीस फॉल और गुप्तेश्वर महादेव गुफा इत्यादि।
दूसरा दिन -
पोखरा से जोमसोम के लिए प्रस्थान करना-

पोखरा बाग्लुङ बस पार्क से जोमसोम के लिए सुबह 7 बजे सीधे बस जाती है। सुबह 7 बजे के बाद जोमसोम के लिए सीधे बस मिलना मुश्किल होता है।फिर पोखरा से बेनी तक बस से जाना पड़ेगा और आगे बेनी से जोमसोम तक बस से जाना पड़ेगा। जोमसोम मे रात रुकना पड़ेगा।
तीसरा दिन -
जोमसोम से मुक्तिनाथ के लिए प्रस्थान करना-

जोमसोम से मुक्तिनाथ जाने के लिए बस या जीप मिलजाती है। रानीपौवा तक बस जाती है। रानीपौवा बस पार्किंग से पैदल या घोड़े से मुक्तिनाथ मंदिर तक चढ़ाई कर जाना होगा।मुक्तिनाथ दर्शन के बाद जोमसोम वापस लौट जाये और जोमसोम में रात रुकना पड़ेगा।
चौथा दिन -
जोमसोम से पोखरा के लिए प्रस्थान करना -
जोमसोम से पोखरा जाने के लिए बस मिल जाती है। पोखरा में रात में रुकना पड़ेगा।
पांचवा दिन -
पोखरा से भारत जाने के लिए प्रस्थान करना-
पोखरा से सोनौली या रक्सौल बॉर्डर के लिए बस मिल जाती है। बॉर्डर से अपने शहर लौट जाओ।

भारत से हवाई मार्ग द्वारा मुक्तिनाथ कैसे जाये -
दिल्ली प्लेन से काठमांडू पहुंचे। काठमांडू से सीधे जोमसोम के लिए प्लेन नहीं है। काठमांडू प्लेन से पोखरा पहुंचना पड़ता है।पोखरा पहुंचने में 25 मिनट का समय लगता है।पोखरा से दूसरे प्लेन से जोमसोम पहुंचे।पोखरा से जोमसोम प्लेन से पहुंचने में भी 25 मिनट का समय लगता है। जोमसोम से सड़क मार्ग द्वारा मुक्तिनाथ पहुंचे।

हेलीकाप्टर द्वारा मुक्तिनाथ कैसे जाये -
काठमांडू और पोखरा से सीधे मुक्तिनाथ के लिए हेलीकाप्टर सेवा उपलब्ध है।

कोठमांडू से जोमसोम के लिए सीधी बस -

काठमांडू से एक दैनिक रात की बस सेवा है। काठमांडू से बस दोपहर में 02:30 बजे निकलती है। जोमसोम के लिए यह सीधी बस मुंग्लिन, पोखरा, बेनी, तातोपानी, घास, कलोपानी, मरफा से होकर जोमसोम तक जाती है। आप सुबह लगभग 07:00 बजे जोमसोम पहुंचेंगे।बस का किराया 1200 भारतीय रूपए होता है।

जोमसोम से काठमांडू के लिए सीधी बस -
जोमसोम से बस दोपहर में 01:00 बजे निकलती है और सुबह लगभग 07:00 बजे काठमांडू वापस आती है।

मुक्तिनाथ की पौराणिक कथा

एक दिन भगवान शिवजी ने अपने तेज को सागर में फेक दिया था। शिवजी के तेज से एक महा तेजस्वी बालक उत्पन्न हुवा। यह बालक आगे जांलधर नाम धारण कर पराक्रमी दैत्य राजा बना। एक कालनेमी नाम के दैत्य राजा थे। उनकी वृंदा नाम की कन्या थी। वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर शक्तिशाली बन गया। वह न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। अपने बल का उसे अभिमान हो गया और वह देवताओं की स्त्रियों को सताने लगा। एक दिन जालंधर शिव का ही रूप लेकर देवी पार्वती के समीप गया, परंतु पार्वती माता ने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया और वहां से अंतध्यान हो गईं।इससे देवी पार्वती क्रोधित हो गयी और महादेव को जलंधर से युद्घ करना पड़ा। वृंदा के सतीत्व के कारण भगवान शिव का हर प्रहार जलंधर निष्फल कर देता था।इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत ज़रूरी था।भगवान विष्णु जलंधर का वेष धारण कर वृंदा के पास पहुंच गये।भगवान विष्णु को अपना पति जलंधर मानकर उनके साथ पत्नी के समान व्यवहार करने लगी। इससे वृंदा का पतिव्रत धर्म टूट गया और शिव ने जलंधर का वध कर दिया।जब वृंदा को इस बात का अहसास हुआ तब वृंदा ने भगवान विष्णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्यतीत करने का शाप दे डाला।कालांतर में शालिग्राम पत्थर का निर्माण हुआ जो काले रंग का जीवाश्म होता है। इसी शालिग्राम पत्थर में भगवान विष्णु निवास करते हैं।तभी से शालिग्राम भगवान विष्णु का प्रतिक माना जाता है। शालिग्राम को भगवान विष्णु के रूप में पूजा जाता है।






























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