Sunday, March 31, 2019

Pashupatinath Temple Kathmandu Nepal

पशुपतिनाथ मंदिर
पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर दूर देवपाटन गांव में बागमती नदी के किनारे स्थित है। यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल है। पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग चतुर्मुखी है। पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग में चारों दिशाओं में एक मुख और एकमुख ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंदल धारण किया है | ये पांचों मुख अलग-अलग गुण दर्शाते हैं। दक्षिण दिशा के मुख को अघोर मुख कहा जाता है, पश्चिम दिशा की ओर के मुख को सद्योजात, पूर्व दिशा के मुख को तत्वपुरुष और उत्तर दिशा की ओर के मुख को वामदेव या अर्धनारीश्वर कहा जाता है।ऊपर की ओर के मुख को ईशान मुख कहा जाता है।


पशुपतिनाथ का अर्थ
पशु मतलब जीव या प्राणी और पति मतलब स्वामी और नाथ मतलब मालिक या भगवान। इसका अर्थ यह है कि संसार के समस्त जीवों के स्वामी या भगवान हैं पशुपतिनाथ।

मंदिर खुलने और बंद होने का समय
खुलने का समय - सुबह 4 बजे
बंद होने का समय -रात 9 बजे


पशुपतिनाथ मंदिर की वास्तुकला
पशुपतिनाथ मंदिर लगभग 264 हेक्टर क्षेत्र में फैला हुआ है। जिसमें 518 मंदिर और स्मारक सम्मिलित है। पशुपतिनाथ मंदिर में गर्भगृह तक पहुंचने के लिये चार दरवाजे बने हुए हैं। चारों दरवाजे चांदी के बने हैं। पश्चिमी द्वार के ठीक सामने नंदी भगवान की पीतल से बनी विशाल प्रतिमा है। इस मंदिर में दो गर्भगृह है भीतर के गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग स्थापित किया गया है।बाहरी गर्भगृह एक खुला गलियारा है।यह मंदिर हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का एक अच्छा मिश्रण है।पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण नेपाल की पैगोडा शैली में कराया गया है।इस पैगोडा शैली में सभी संरचानाये घन के आकार में बनायीं गयी है और इसमें लकड़ी से बनाये हुए छत का इस्तेमाल किया गया है। मंदिर के छत का निर्माण तांबे से किया गया है तांबे पर सोने की परत चढाई गई है।मंदिर की उचाई 23 मीटर और 7 सेमी है ।


पशुपतिनाथ मंदिर के परिसर में मौजूद मंदिर
कीर्ति मुख भैरव मंदिर , उन्मत्ता भैरव मंदिर,वासुकि नाथ मंदिर ,सूर्य नारायण मंदिर, विराट स्वरूप मंदिर,बूदानिल कंठ मंदिर 

पौराणिक कथा
१) एक पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत के युद्ध में विजयी होने के बाद। कौरवो का  वध करने के कारन पांडवो को बंधू हत्या का पाप लग गया था। बंधू हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव भगवान शिव की पूजा कर शिव का आशीर्वाद पाना चाहते थे। लेकिन शिवजी पांडवो से नाराज थे।पांडव शिवजी के दर्शन के लिए काशी गए। काशी में शिवजी ने पांडव को दर्शन नहीं दिए।जो की शिवजी पांडवो से नाराज थे इसलिए पांडवो को दर्शन देना नहीं चाहते थे। शिवजी अंतध्र्यान होकर केदारनाथ में जा बसे। पांडव अपने निक्ष्चय पर दृढ़ थे। किसी भी हालात में शिवजी का आशीर्वाद पाकर बंधू हत्या से मुक्ति पाना चाहते थे।पांडवो को शिवजी केदारनाथ होने की भनक लग गई। पांडव केदारनाथ पहुंच गए। शिवजी ने बैल का रूप धारण कर लिया और अन्य गाय बैल में जा मिले।पांडव जान गए थे शिवजी इन्ही गाय बैलो में मौजूद है। लेकिन पांडवो के समझ में नहीं आरहा था इन मे से शिवजी कोनसे है।भीमजी ने अपना विशाल रूप धारण कर लिया और दोनों पहाड़ो पर पैर फैलाकर खड़े हो गये।सभी गाय बैल भीमजी के पैरो के निचे से निकल गए। एक ही बैल बचा जो भीम के पैर के निचे से जाने को तैयार नहीं था। भीमजी  समज गये  यही शिव है।भीमजी तुरन्त इस बैल को पकड़ ने के लिए झपटे बैल रूपी शिव भूमि में अंतध्र्यान होने लगे तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। शिवजी के बैल की त्रिकोणात्मक पीठ की आकृति पिंड के रूप को केदारनाथ कहा जाता है।जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपतिनाथ कहा जाता है।

२) नेपाल महात्म्य और स्थानीय किंवदंती के अनुसार शिवजी एक बार काशी के अन्य देवताओं को छोड़कर चुपकेसे बागमती नदी के दूसरे किनारे जंगल में स्थित मृगस्थली चले गए। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। भगवान शिवजी को काशी में न पाकर समस्त देवतागण परेशान और दुःखी हो गए। शिवजी को ढूंढते बागमती नदी के किनारे स्थित जंगल में पहुंच गए।शिवजी ने देवताओ को अपनी तरफ आते देख उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।

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