Wednesday, December 19, 2018

Grishneshwar Temple Maharashtra Complete travel guide in hindi

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग
महाराष्ट्र के औरंगाबाद से लगभग ३० कि.मी. दूर वेरुल गांव में घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग शिवजी के 12 ज्योतिर्लिंगों में आखिरी माना जाता है।इसे घुश्मेश्वर , घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर लेने से मनुष्य को जीवन का हर सुख मिलता है और जाने अनजाने में हुए पाप से मुक्ति मिलती है।
औरंगाबाद कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग
औरंगाबाद हवाई अड्डा औरंगाबाद शहर से 10 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। हैदराबाद, दिल्ली, उदयपुर, मुंबई, जयपुर, पुणे और नागपुर प्रमुख शहरों से सीधे हवाई सेवा उपलब्ध है।हवाई अड्डे से औरंगाबाद के सभी प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए बसें और टैक्सी उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग
औरंगाबाद सभी प्रमुख शहरों से रेल द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।भारतीय रेलवे के दक्षिण मध्य रेलवे क्षेत्र के नांदेड डिवीजन के सिकंदराबाद-मनमाड खंड पर स्थित एक स्टेशन है। नांदेड़, परली, नागपुर, निजामाबाद, नासिक, पुणे, कुरनूल, रेनिगुंटा, मदुरै, भोपाल, ग्वालियर, वडोदरा और नरसापुर से रेल सेवा उपलब्ध है।
औरंगाबाद से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुंचे
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर पहुंचने के लिए औरंगाबाद के सेंट्रल बस स्टैंड से महाराष्ट्र गवर्मेंट की बस सेवाएं उपलब्ध है। बस स्टैंड से ही टैक्सी या जीप किराये पर मिल जाती है। 
घृष्णेश्वर यात्रा कितने दिन कितने दिन लगते है :- २ दिन 
घृष्णेश्वर में कहा रुके :-
घृष्णेश्वर मंदिर ट्रस्ट के भक्त निवास ,मौनगिरि आश्रम ,जैन धर्मशाला  इनमे ३५० से ७०० तक किराये पर रूम मिल जाती है। प्राइवेट होटल में अपने बजट अनुसार रूम मिल जाती है। 
दर्शन  के लिए कब जाये :- सितम्बर से मार्च 
ड्रेस कोड 
पुरुषों को शर्ट (कमीज) एवं बनियान तथा बेल्ट उतार कर मंदिर के भीतर प्रवेश मिलता है।
दर्शन का समय
मंदिर रोज सुबह 5 :30 को खुलता है और रात 9 :30 को बंद होता है. श्रावण के महीने में मंदिर सुबह 3 खुलता हैऔर रात 11 बजे बंद होता। 
आरती का समय 
सुबह आरती 6 बजे तथा रात 8 बजे होती है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापना कैसे हुई
घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे एक रोचक कथा है।देवगिरी पर्वत के पास सुधर्मा नाम का एक ब्राह्मण निवास करता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। विवाह के कई वर्षो के बाद भी सुदेहा को कोई संतान नहीं हुयी। सुदेहा की एक छोटी बहन थी घुश्मा।पुत्र प्राप्ति के इच्छा से सुदेहा ने घुश्मा का विवाह अपने पति से करवा दिया। घुश्मा शिवजी की बहुत बड़ी भक्त थी, वह रोजाना सौ पार्थिव शिवलिंग बना कर उनकी पूजा करती थी और पूजा के बाद उन्हें एक सरोवर में विसर्जित कर देती थी।कुछ वर्ष बाद घुश्मा ने एक पुत्र को जन्म दिया।सुधर्मा सुदेहा से ज्यादा समय घुश्मा को देने  लगा।इस कारन सुदेहा को घुश्मा से जलन होने लगी और एक दिन सुदेहा ने घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दि और उसके शव को उसी सरोवर में डुबो दिया, जहां घुश्मा शिवलिंगों को विसर्जित करती थी। जब घुश्मा को अपने पुत्र के हत्या के बारे में पता चला तो भी वह जरा भी विचलित नहीं हुई और रोज की तरह शिव की भक्ति में लीन हो गयीऔर शिवजी से अपने पुत्र को वापस पाने की कामना करने लगी। शिवलिंग की पूजा के बाद जब घुश्मा शिवलिंगों को सरोवर में विसर्जित करने लगी तो उसका पुत्र सरोवर से जीवित बाहर निकल आया।घुश्मा ने अपनी बड़ी बहन को माप कर दिया उस पर जरा भी क्रोध नहीं आया। घुश्मा के इसी दयालुता और भक्ति से खुश होकर शिवजी उसके सामने प्रकट हो गये और वरदान मांगने को कहा।घुश्मा ने शिवजी से हमेशा के लिए इसी स्थान पर रहने का वरदान मांगा। घुश्मा के कहने पर भगवान शिव उसी स्थान पर घुश्मेश्वर लिंग के रूप में स्थापित हो गए।
घृष्णेश्वर मंदिर वास्तु कला 
घृष्णेश्वर मंदिर में तिन द्वार हैं एक महाद्वार और दो पक्षद्वार। गर्भगृह के ठीक सामने एक विशाल सभाग्रह है। 24 पत्थर के स्तंभों पर सभा मंड़प बनाया गया है. स्तंभों पर सुन्दर नक्काशी उकेरी गई है। मंडप के मध्य में कछुआ है और दिवार की कमान पर गणेशजी की मूर्ति है। सभा मंड़प में पाषाण की ही नंदी भगवान की मूर्ति स्थित है जो की शिवलिंग के ठीक सामने है। मंदिर के अर्धउंचाई के लाल पत्थर पर दशावतार के द्रश्य को दर्शाया गया है और अनेक देवी देवताओं की मूर्तियाँ तराशी गई हैं। 
शिवालय तीर्थ
घृष्णेश्वर मंदिर के नजदीक ही शिवालय तीर्थ है जिसका निर्माण अहिल्याबाई होलकर ने किया था। शिवतीर्थ की पौराणिक कथा इस प्रकार है।एक बार एक राजा शिकार करने जंगल में चला गया। शिकार करते समय राजा ने ऋषि और मुनी के साथ रहने वाले पशु को मार डाला। यह देखकर ऋषियों ने राजा को शाप दिया जिसके परिणाम स्वरूप, उसके पुरे शरीर में कीड़े लग गये।राजा को भयंकर पीड़ा होने लगी।वह जंगल में इधर उधर पागलो के भांति भटकता रहा।प्यास की वजह से उसका गला सुख गया। राजा को एक पानी का गड्डा नजर आया जैसे ही राजा ने पानी पीना शुरू किया, एक चमत्कार हुआ।उसके शरीर में लगे कीड़े नष्ट हो गये और राजा एकदम स्वस्थ हो गया। राजा ने उसी जगह घोर तपस्या की,भगवान ब्रम्हा प्रसन्न हो गये और ब्रम्हाजी ने एक विशाल सरोवर का निर्माण कराया।जिसे ब्रम्हा सरोवर कहा जाने लगा। बाद में इसे लोग शिवालय तीर्थ के नाम से जानने लगे। 

Grishneshwar Yatra Youtube video



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