Tuesday, October 30, 2018

Naina devi bilaspur himachal pradesh travel guide in hindi

नैना देवी कैसे पहुंचे 
हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा चंडीगढ़ में है और चंडीगढ़ से नैना देवी लगभग 110 किमी दुरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
निकटतम रेलवे स्टेशन आनंदपुर साहिब में है और वहां से नैना देवी लगभग 25 किमी दुरी पर स्थित है।
सड़क मार्ग
नैना देवी मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग 21 से जुड़ा हुआ है।पंजाब और हिमाचल प्रदेश के सभी महत्वपूर्ण शहरों से नियमित राज्य परिवहन बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

आनंदपुर साहिब और चंडीगढ़ तक ट्रैन से पंहुचा जा सकता है। आनंदपुर साहिब और चंडीगढ़ से मंदिर पहुंचने के लिए टैक्सी किराये पर मिल जाती है। किरतपुर साहिब से नैनादेवी मंदिर 30 किमी दुरी पर स्थित है। जिसमें से 18 किलोमीटर पहाड़ी रास्ता है। आनंदपुर साहिब से दूरी 25 किमी है जिसमें से 8 किलोमीटर खतरनाक पहाड़ी रास्ता है।


नैना देवी पहाड़ी पर जाने का रोपवे का समय
मार्च से सितम्बर         सुबह ८:०० बजे से सायं ७:०० बजे तक
अक्तूबर सुबह               सुबह ८:०० बजे से सायं ८:०० बजे तक
दिसम्बर से फरबरी      सुबह ९:०० बजे से सायं ५:३० बजे तक


रोपवे का टिकट
बड़ो के लिए एक तरफ का टिकट     रू.110
बड़ो के लिए दोनों तरफ का टिकट   रू.170
बच्चो के लिए एक तरफ का टिकट  रु.55
(आयु 3 से 12 वर्ष )बच्चो के लिए दोनों तरफ का टिकट रु.80
विकलांग के लिए मुक्त

नैना देवी पौराणिक कथा
एक नैना नाम का गुज्जर युवक था। एक दिन वह अपने पशुओ को चराने जंगल में गया। उसने देखा एक गाय एक पत्थर पर दूध बरसा रही थी। जब भी वह लड़का पशु को चराने जंगल में जाता था गाय को पत्थर पर दूध बरसाते देखता था। यह सिलसिला कई दिनों तक चला। एक दिन देवी माँ ने उसके  सपने आकर कहा जिस पत्थर पर गाय दूध बरसाती है वह पत्थर उनकी पिंडी है। उस युवक ने सपने की बात राजा बीर चंद को बतायी।राजा ने जंगल में जाकर देखा वास्तव में एक गाय पत्थर पर दूध बरसा रही थी। राजा ने उसी स्थल पर देवी का मंदिर का निर्माण कराया। तभी से यह मंदिर नैना नाम से विख्यात हुवा।


आरतियाँ
मंगल आरती -
आरती का समय :- सुबह ४  बजे 
माता की पहली आरती मंगल आरती कहलाती है।  प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में लगभग ४.०० बजे घंटा बजा कर माता को जगाया जाता है।  बाद में माता की शेय्या समेट कर रात को गडवी में रखे जल से माता के चक्षु और मुख धोये जाते है। माता को काजू, बादाम, खुमानी, गरी, छुआरा, मिश्री, किशमिश, आदि में से पांच मेवों का भोग लगाया जाता है। जिसे 'मोहन भोग ' कहते है।

श्रृंगार आरती 
आरती का समय :- सुबह ६ बजे
श्रृंगार आरती के लिए मंदिर के पृष्ठ भाग की ढलान की और निचे लगभग २ किलोमीटर की दुरी पर स्थित 'झीडा' नामक बाऊडी से एक व्यक्ति जिसे 'गागरिया' कहते है , नंगे पांव माता के स्नान एवं पूजा के लिए पानी की गागर लाता है। श्रृंगार आरती लगभग ६.०० बजे शुरू होती है जिसमे षोडशोपचार विधि से माता का स्नान तथा हार श्रृंगार किया जाता है।इस समय सप्तशलोकी दुर्गा और रात्रिसूक्त के श्लोको से माता की स्तुति की जाती है।  माता को हलवा और बर्फी का भोग लगता है जिसे 'बाल भोग' कहते है।

मध्यान्ह आरती -
आरती का समय :- सुबह दोपहर १२  बजे 
इस अवसर पर माता को राज भोग लगता है। राज भोग में चावल, माश की दाल, मुंगी साबुत या चने की दाल, खट्टा, मधरा और खीर आदि भोज्य व्यंजन तथा ताम्बूल अर्पित किया जाता है।  मध्यान्ह आरती का समय दोपहर १२.०० बजे है।  इस आरती के समय सप्तशलोकी दुर्गा के श्लोको का वाचन होता है।

सायं आरती -
आरती का समय :- श्याम ६.३० बजे 
सायं आरती के लिए भी झीडा बाऊडी से माता के स्नान के लिए गागरिया पानी लाता है। लगभग ६.३० बजे माता का सायंकालीन स्नान एवं श्रृंगार होता है।  इस समय माता को चने और पूरी का भोग लगता है। ताम्बूल भी अर्पित किया जाता है। इस समय के भोग को 'श्याम भोग' कहते है।

  
















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