Friday, August 10, 2018

Vrindavan Travel guide & visiting places in hindi

How to reach Vrindavan

वृन्दावन कैसे पहुंचे 
हवाई मार्ग
निकटतम घरेलू हवाई अड्डा आगरा में है, वृन्दावन से 65 किलोमीटर दूर है, जबकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नई दिल्ली में 165 किलोमीटर की दूरी पर है। आप हवाई अड्डे से किसी भी हवाई अड्डे से आसानी से टैक्सी प्राप्त कर सकते हैं।
रेल द्वारा
वृंदावन रेल से आने के लिए आपको मथुरा आना पड़ता है। मथुरा रेल्वे स्टेशन से वृन्दावन १५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।मथुरा रेल्वे स्टेशन से वृन्दावन आने के लिए ऑटो या टैक्सी मिल जाती है। एक यात्री ट्रेन मथुरा और वृंदावन के बीच भी चलती है।
सड़क मार्ग द्वारा
दिल्ली से वृंदावन या मथुरा की बसें कश्मीरी गेट के पास इंटरस्टेट बस टर्मिनल (आईएसबीटी) से और दिल्ली के दक्षिणपूर्व हिस्से में आश्रम बस स्टॉप से निकलती हैं। बसें मथुरा की ओर एक घंटे के नियमित अंतराल दक्षिण पूर्व दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास सराई काले खान इंटर-स्टेट बस टर्मिनल से निकलती हैं।

मथुरा से वृन्दावन कैसे पहुंचे
मथुरा से वृंदावन टैक्सी द्वारा यात्रा

मथुरा से वृंदावन के बीच की दूरी केवल 15 किलोमीटर है और मथुरा और वृंदावन के बीच टैक्सी चलती है। इस दूरी को पार करने के लिए टैक्सी में लगभग आधा घंटा लगता है और टैक्सी का किराया 250-300 के बिच लगता है। 
मथुरा वृंदावन ऑटो रिक्शा द्वारा यात्रा
टैक्सियों की तुलना में ऑटो रिक्शा का किराया लगभग आधा हैं, लेकिन वृंदावन पहुंचने के लिए 15 से 20 मिनट अधिक समय लगता हैं। रिक्शा स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं और ऑटो वाले किराया 100 -150 लेते है। अगर आप शेयर ऑटो से जाना चाहते है तो उसका किराया २० रुपये ऑटो वाले लेते है। 
मथुरा और वृंदावन के बीच मीटर गेज ट्रेन
मथुरा और वृंदावन मीटर गेज ट्रेन से भी जुड़े हुए हैं।मथुरा से वृन्दावन ट्रैन का समय सुबह 6 .35, 8 .55 और दुपहर 3 .२० और वृन्दावन से मथुरा ट्रैन का समय सुबह 7 .25 , 9 .25 ,दुपहर 4 .45 , यात्रा का समय करीब आधे घंटे है। 

वृन्दावन में कितने दिन के लिए रुके :- २ दिन 

वृन्दावन में कहा रुके 
वृन्दावन में रात गुजार ने के लिए अपने बजेट नुसार  कमरा मिल जाता है। वृन्दावन में बहुत सारे धर्मशाला और आश्रम है। उसमे 200 -300 में किराये पर कमरा मिल जाता है।ज्यादा तर होटल ,आश्रम,धर्मशाला प्रेम मंदिर रोड पर और Iskcon मंदिर के नजदीक बने है। 

वृन्दावन के दर्शनीय स्थल
(जिन स्थलों के बारे में youtube video में बताया नहीं गया  उनके ही बारे में डिटेल्स में जानकारी दी है।
प्रमुख मंदिर के बारे में जानकारी के लिए video देखे
वृन्दावन यात्रा पार्ट -१ 

(पागल बाबा मंदिर ,प्रेम मंदिर ,  ISKCON )
वृन्दावन यात्रा पार्ट -२
(बांके बिहारी मंदिर ,श्री गोविन्द देवजी मंदिर ,श्री रंगजी मंदिर ,निधिवन ,केशी घाट )


वृन्दावन के  प्रमुख मंदिर 

मदन मोहन मन्दिर
कालिया घाट के नजदीक स्थित मदन मोहन मंदिर वृंदावन में सभी गोस्वामी मंदिरों में से सबसे पुराना है।इस मंदिर का निर्माण सनातन गोस्वामी द्वारा किया गया है। मंदिर एक प्रभावशाली, सुंदर स्मारक और बढ़िया सृजन का एक उदाहरण है। यह लाल बलुआ पत्थर के साथ अंडाकार आकार में बनाया गया है। मंदिर 20 मीटर ऊंचा है और यमुना नदी के पास स्थित है। सनातन गोस्वामी के भजन कुटीर परिसर में मौजूद हैं, जबकि उनकी समाधि मंदिर के पीछे की तरफ है। मंदिर में सनातन गोस्वामी की कुछ मूल ग्रंथ सामग्री, पांडुलिपियों को बरकरार रखा गया है।मदन मोहन मंदिर निर्माण की पौराणिक कथा इस प्रकार है, एक दिन पंजाब का एक कारोबारी रामदास खत्री जिसे कपूरी नाम से भी जाना जाता था। एक दिन माल से भरी नाव लेकर आगरा जाने के लिए निकल पड़ा। वृन्दावन में यमुना नदी में कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी। तीन दिनों तक वह प्रयास करता रहा लेकिन उसकी रेत में फंसी नाव निकलने का नाम नहीं ले रही थी। वह यमुना किनारे पर आकर पहाड़ी पर चढ़ा। वहा उसे एक संत मिले उन्होंने कारोबारी को मदनमोहन से प्रार्थना करने की सलाह दी। कारोबारी ने संत के कहने अनुसार मदनमोहन से प्रार्थना की। तभी चमत्कार हुवा तीन दिन से फंसी नाव तत्काल तैरने लगी। जब कारोबारी आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा उस संत को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की।

श्री राधा दामोदर मंदिर
श्री राधा दामोदर मंदिर वृंदावन में सेवा कुंज के पास लोई बाज़ार में स्थित एक प्राचीन मंदिर है।संवत 1599 सन 1543 की माघ शुक्ल दशमी के दिन श्रीरूप गोस्वामी ने यहाँ राधा दामोदर जी के विग्रहों की स्थापना करके उनकी सेवा का भार जीव गोस्वामी को सौंपा था। वृंदावन पर औरंगजेब के हमले के दौरान, राधा दामोदर की मूर्तियों को जयपुर में कुछ समय के लिए स्थानांतरित कर दिया गया और उन्हें 1739 ईस्वी में वृंदावन वापस लाया गया।इस मंदिर में श्रीरूप गोस्वामी के भजन कुटीर और समाधि के साथ-साथ श्री जिवा गोस्वामी की समाधि, कृष्णदास कविराज गोस्वामी, भुगरभा गोस्वामी और श्रीला भक्तिवेन्द्र स्वामी प्रभुपाद के भजन कुटीर मंदिर परिसर में मौजूद हैं। जिवा गोस्वामी ने यहां एक पुस्तकालय की स्थापना की, जहां उन्होंने गोस्वामी की सभी मूल पांडुलिपियों को संग्रहित किया।

इस मंदिर में एक गोवर्धन-शिला है, जिसे गिरि राज चरण शिला कहा जाता है, जिसे सनातन गोस्वामी द्वारा पूजा की जाती थी। इसमें भगवान कृष्ण का पदचिह्न है। कार्तिका के मौसम के दौरान, दिवाली के दिन अनाकुत महोत्सव के रूप में मनाया जाता है जिसमें गिरिराज शिला को भक्त दर्शन के लिए गर्भगृह से बाहर रखा जाता है।इस शिला की चार परिक्रमाएँ करने से गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा का फल मिलता है। इस मंदिर की परिक्रमा करने से उसमें विराजमान गिरिराज शिला की भी परिक्रमा हो जाती है। इसकी एक किलोमीटर से भी कम की चार परिक्रमाएँ करने से श्रृद्धालु को  गिरिराज गोवर्धन की सात कोस लम्बी परिक्रमा करने का पुण्य प्राप्त होता है।

श्री राधा रमन मंदिर
यह मंदिर भगवान कृष्ण के राधा रामन के रूप में समर्पित है। राधा रमन की प्रतिमा शालिग्राम से प्रकट हुयी है। यह शालिग्राम गोपाल भट स्वामी को गंडक नदी में मिला था। इस शालिग्राम को उन्होंने वृन्दावन के एक मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया और उसकी पूजा करने लगे। एक दिन एक दर्शनार्थी ने गोपाल भट को कहा चन्दन लगाए शालिग्राम जी अच्छे नहीं दिखते मानो कढ़ी में बैंगन पड़ा हो।दर्शनार्थी की बात से गोपाल भट दुखी होगये। जब सुबह हुयी तो शालिग्राम से राधारमण की प्रतिमा प्रगट हो गई। वृन्दावन पर औरंगजेब के हमले के बावजूद राधारमण की एक मात्र प्रतिमा वृन्दावन से बाहर नहीं गई। लोगो ने उसे वृन्दावन में ही सुरक्षित संभालकर रखा।इस मंदिर की विशेषता यह है की , सभी मंदिरो में कृष्णा जन्मष्टामी रात्रि के समय मनाई जाती है। लेकिन राधारमण मंदिर में कृष्ण जन्माष्ठमी उत्सव दोपहर 12 बजे मनाया जाता है।

शाहजी मंदिर
वृंदावन रेलवे स्टेशन से 1 किमी की दूरी पर, शाहजी मंदिर वृंदावन में निधिवन के पास स्थित एक लोकप्रिय मंदिर है।भगवान कृष्ण को समर्पित, शाहजी मंदिर 1860 में लखनऊ के शाह कुंदन लाल, एक अमीर ज्वैलर द्वारा डिजाइन और बनाया गया था।सेठ कुन्दनलाल शाह श्री चैतन्य महाप्रभु के अनन्य भक्त थे। इस मंदिर में भगवान कृष्ण को छोटे राधा रमन के नाम से जाना जाता है। सफेद रंगीन मंदिर विशिष्ट कलात्मक शिल्प कौशल दिखाता है जो इसे शहर के सबसे लोकप्रिय मंदिरों में से एक बनाता है।
यह मंदिर अपने सुंदर वास्तुकला और संगमरमर की मूर्ति के लिए जाना जाता है, यह मंदिर कई पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह मन्दिर वास्तुकला, चित्रकला तथा शानदार मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय है।सफ़ेद संगमरमर के इस अत्यन्त आकर्षक मन्दिर की विशेषता है कि इसके 12 स्तंभ सर्पाकार में एक ही पत्थर की शिला से निर्मित हैं। प्रत्येक स्तंभ 15 फीट ऊंचा है। इस मंदिर में बसंती कमरा है, जो एक दरबार हॉल है जिसमें सुंदर चित्र बनाये गए हैं। दीवारों के पर और छत पर, सुंदर चित्र हैं जो भगवान कृष्ण के जीवन की कहानियों को  दर्शाती है। कमरा साल में केवल दो बार खोला जाता है। पहली बार बसंत पंचमी के अवसर पर दो दिन के लिए और श्रावण मास के अंत में त्रयोदशी और चतुर्दशी के दिन खोला जाता है।

राधावल्लभ मंदिर
राधावल्लभ मंदिर में स्थापित प्रतिमा में राधा और कृष्ण दोनों ही नजर आते हैं। इसमें आधे हिस्से में श्री राधा और आधे में श्री कृष्ण दिखाई देते हैं। माना जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से निष्कपट होकर राधावल्लभ का दर्शन करता है सिर्फ उस पर ही भगवान प्रसन्न होते हैं। इसी कारण इनके दर्शन को लेकर भक्तो में भजन-कीर्तन, पूजा पाठ करने का उत्साह रहता है। 
पौराणिक कथा नुसार भगवान विष्णु के आत्मदेव नाम के भक्त हुवा करते थे। एक बार उनके मन में भगवान शिवजी के दर्शन पाने की इच्छा हुई। आत्मदेव तप करने बैठ गये। आत्मदेव के कठोर तपस्या को देखकर शिवजी प्रसन्न हुए और आत्मदेव को वरदान मांगने को कहा।आत्मदेव को सिर्फ शिवजी के दर्शनों की अभिलाषा थी जो कि पूरी हो चुकी थी।आत्मदेव ने शिवजी से कहा हे भोलेनाथ आपके दर्शन की आस थी जो पूरी हो चुकी है। मुझे सबकुछ मिल गया मुझे ओर कुछ नहीं चाहिये। फिर भी शिवजी ने वरदान मांगने को कहा। आत्मदेव ने शिवजी से कहा हे भोलेनाथ आपको सबसे प्रिय हो वही दे दीजिये। तब शिवजी ने राधावल्लभलाल के विग्रह को प्रकट किया।आत्मदेव राधावल्लभ के विग्रह को वृन्दावन लेकर आये और उसे वृन्दावन में स्थापित कर दिया।

सेवा कुंज
सेवा कुंज भी निधिवन जैसा तुलसी के वृक्ष का  एक सुंदर बगीचा है, जिसे अक्सर भक्तों और प्रकृति प्रेमियों द्वारा देखा जाता है। बगीचे के अंदर एक छोटा सा मंदिर है, जो राधा-कृष्ण को समर्पित है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने इस बगीचे में राधा के साथ रसलीला रचाई थी।यह भी कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने इस बगीचे में गोपी के साथ नृत्य करने में काफी समय बिताया था।अंधेरे होने के बाद बगीचे में प्रवेश करने पर प्रतिबंध है। एक प्रसिद्ध मिथक के अनुसार, राधा के साथ भगवान कृष्ण रात में इस जगह पर जाते हैं। यह उद्यान राधा दामोदर मंदिर, राधा श्यामसुंदर मंदिर और राधा-वृंदावन-चंद्र मंदिर जैसे विभिन्न मंदिरों से घिरा हुआ है।

जयपुर मंदिर
जयपुर मंदिर 1917 में जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय द्वारा बनाया गया था। यह सुंदर नक्काशीदार मंदिर श्री राधा माधव को समर्पित है। संगमरमर परिष्करण और एकल चट्टान संरचना मंदिर की सुंदरता को बढ़ाती है, जो पर्यटकों को आकर्षित करती है।

श्री राधा रास  बिहारी अष्ट सखी मंदिर 
श्री राधा रास बिहारी अष्ट सखी मंदिर पहला भारतीय मंदिर है, जो राधा-कृष्ण और उनके अष्ट सखी को समर्पित है। अष्ट सखी देवी राधा की  आठ सखीया थी, जो भगवान कृष्ण के साथ रास लीला में शामिल थी।यह मंदिर भगवान कृष्ण और राधा रानी के रास लीला का प्रमुख स्थान था।

श्री गोपेश्वर महादेव मंदिर 
श्री गोपेश्वर महादेव मंदिर एक शिव मंदिर है। शहर के सबसे प्राचीन  मंदिरों में से एक मंदिर है। पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन  भगवान शिव को कृष्णा भगवान और गोपियों की रासलिला देखने का मोह हुवा। उन्होंने एक गोपी का रूप धारण कर लिया और रास लीला में शामिल हो गए।  श्री कृष्ण भगवान ने शिव को पहचान लिया और उन्हें गोवेश्वर नाम से वृन्दावन में स्थापित कर दिया। 

मथुरा यात्रा की प्लानिंग की जानकारी

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