Monday, April 16, 2018

Amritsar Golden Temple Complete travel guide in hindi

अमृतसर कैसे पहुंचे

रेल मार्ग
अमृतसर  के लिये दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, अहमदाबाद, कोलकाता, आगरा और चंडीगढ़ सहित अन्य सभी शहरों रेल्वे सेवाये उपलब्ध है।
सड़क मार्ग 
अमृतसर सड़क मार्ग से देश के सभी  बड़े शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। ग्रांड ट्रंक रोड अमृतसर को दिल्ली से जोड़ता है। आईएसबीटी, दिल्ली से अमृतसर तक नियमित बसें उपलब्ध हैं। चंडीगढ़, डलहौसी, चंबा और धर्मशाला के बीच नियमित बस सेवा उपलब्ध है। 
हवाई मार्ग 
निकटतम हवाई अड्डा अमृतसर में राजा सांसी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। इसे  श्री गुरु राम दासजी  अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा  भी कहा जाता है, यह शहर के केंद्र से करीब 11 किलोमीटर दुरी पर  स्थित है, और यह भारत के अन्य शहरों और कई अंतरराष्ट्रीय शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। 
अमृतसर की यात्रा कितने दिन की होगी :-  २ दिन 
हॉटेल रूम कितने दिन के लिये बुक करे :-   १ दिन 
स्वर्ण मंदिर के यात्री निवास में ऑनलाइन रूम बुक करने के लिए वेब की लिंक पर क्लिक करे  :-
https://www.sgpcsarai.com/Home/Index   
ऑनलाइन रूम बुक कोनसे यात्री निवास में की जाती है 
माता गंगाजी यात्री निवास 
सारागढ़ी यात्री निवास 
ऑफलाइन रूम बुकिंग कोनसे  यात्री निवास में की जाती है 
श्री गुरु रामदास निवास 
श्री गुरु नानक निवास 
श्री गुर अर्जन देव निवास 
श्री गुरु गोविन्द सिंह जी NIR निवास 
न्यू अकाल रेस्ट हॉउस 
बाबा दीप सिंह जी निवास 
माता भाग कौर जी निवास 

स्वर्ण मंदिर 

स्वर्ण मंदिर को हरमंदिर साहिब या दरबार साहिब भी कहा जाता है। स्वर्ण मंदिर अमृतसर भारत (श्री हरिमंदिर साहिब अमृतसर) केवल सिखों का एक प्रमुख  धार्मिक स्थान नहीं है, बल्कि मानव भाईचारे और समानता का प्रतीक भी है।  यह सिखों की विशिष्ट पहचान, महिमा और विरासत का भी प्रतिनिधित्व करता है।स्वर्ण मंदिर में सभी धर्म और जाती के लोगो को प्रवेश दिया जाता है। सीखो के तृतीय गुरु श्री गुरु अमर दास जी द्वारा  हरमंदिर साहब के निर्माण की  सलाह दी गई थी।  चौथे सिख गुरु श्री गुरु राम दास जी  ने 1577 ईसवी में श्री हरमंदिर साहिब के अमृत सरोवर की खुदाई शुरू करवाई थी।  15 दिसंबर, 1588  को पांचवे सिख गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी  ने श्री हरिमंदिर साहिब का निर्माण का कार्य  शुरू किया। पहली बार श्री ग्रन्थ साहिब को 16 अगस्त 1604 को हरमंदिर साहिब में स्थापित किया गया था। श्री बाबा बूढ़ा जी को  पहले प्रमुख ग्रंथि ( पुजारी) नियुक्त किया गया था।हरमंदिर साहिब  एक अनूठी सिख वास्तुकला है। गुरुद्वारा समता और विनम्रता का सबक सिखाता है। महाराजा रणजीत सिंह ने १९ वि शताब्दी  इस गुरुद्वारे की ऊपरी छत को 400 कि.ग्रा  सोने के वर्क से ढंक दिया, तभी से इसका नाम स्वर्ण मंदिर पड़ा।

दुःख भजनी बेरी तीर्थस्थल

दुनीचंद खत्री नाम का एक आमिर जमींदार था।उसकी पांच सुन्दर प्रतिभाशाली बेटिया थी। एक दिन दुनीचंद ने अपने बेटियों से पूछा बताओ आपको भोजन कौन देता है। बड़ी बेटी ने "कहा आप ही हमारे अन्न डाटा है, सभी चीजे हमें आप ही देते है पिताजी".लेकिन छोटी बेटी रजनी ने कहा, "यह जीवन भगवान ने दिया है तो सभी का ख्याल भगवान रखता है वही हमारा जीना मरना तय करता है" इस उत्तर को सुनते हुए, दुनि चंद इतना गुस्से हुए की उन्होंने रजनी की शादी एक कुष्ठ रोग से कर दी।  लेकिन रजनी ने इस बात की कोई परवाह की ना उसे कोई दुःख हुवा।उसने अपने पति के रूप में कोढ़ी को स्वीकार किया और उनसे बहुत प्यार किया। उन दिनों में गुरु राम दास जी अमृतसर में एक नया शहर बना रहे थे। रजनी ने अपने पति को साथ लिया और अमृतसर पहुंच गयी। रजनी ने  गुरु के भक्तों से मुलाकात की जब भक्तों ने देखा कि उनके पति कुष्ठ रोगी थे, उनको रजनी की दया आई और उन्हें रहने के लिए कमरा प्रदान किया। रजनी को  अन्य भक्तों के साथ रसोई में खाना पकाने के लिए नियुक्त किया गया। जब वह अपने काम पर जाती तो अपने पति को उसके साथ लेती थी तालाब के किनारे एक छायादार पेड़ के नीचे बैठाकर रसोई बनाने चली जाती थी।  
एक दिन उसका कोढ़ी पति तालाब के किनारे बैठा हुआ था, तो उसने देखा एक कौवा तालाब में गिरा और बाहर  निकला तो उसका रंग सफ़ेद हो चूका था। यह देखकर उसने यह निष्कर्ष निकाला कि तालाब का पानी साधारण पानी नहीं है। उसने भी तालाब में डुबकी लगाई और जब वह बाहर आया तो खुद को स्वस्थ पाया उसका कोढ़ पूरी तरह ठीक हो गया था और वह जवान दिखने लगा था। रजनी जब लंगर से लौटी तो स्वस्थ पति को देखकर खुश हो गयी। उसके पति ने उसे पूरी कहानी बताई।लोगो को इस बात का पता चला तो लोग इस स्थान पर स्नान करने लगे।जिस बेरी के पेड़ के निचे कुष्टरोगी  बैठा हुआ था वह स्थान दुःख भजनी के रूप में जाना जाने लगा क्योंकि यह दर्द और दुःखों को दूर करता है। 

 बाबा दीपसिंह जी 

बाबा दीप सिंह  सिखों में सिख धर्म के सबसे पवित्र शहीदों में से एक और एक उच्च धार्मिक व्यक्ति के रूप में सम्मानित है। उन्हें अपने बलिदान और सिख गुरुओं की शिक्षाओं के प्रति समर्पण के लिए याद किया जाता है। 1755 में अफगानिस्तान के सम्राट अहमद शाह अब्दाली ने पांचवी बार भारत पर हमला किया। दिल्ली सहित कई भारतीय शहरों में  लूटपाट मचाई।महिलाओ पर अत्याचार किये और महिला, पुरुषो को बंदी बना लिया।  जब बाबा दीप सिंह जी को इस क्रूरता के बारे में पता चला, उन्होंने सिखों का एक समूह लिया और अहमद शाहकी सेनाओं पर हमला किया। बाबा दीप सिंह जी और उनके साथियों ने अहमद शाह के सैनिको को भगा दिया और  लुटे हुए सोने जवाहरात को लोगो में बाट दिए और बंदी बनाई महिला ,पुरुषो को मुक्त कर दिया, उन्हें अपने घर सुरक्षित भेज दिया।
अहमद शाह अब्दाली सिखों के हमले से नाराज हुआ , उसने  सिख समुदाय को नष्ट करने का फैसला किया। उसने अपने बेटे जहन खान को  सिख की आध्यात्मिक ताकत श्री हरीमंदिर साहिब को नष्ट करने का आदेश दिया।1757 में, जहन  खान ने भारी तोपखाने के साथ अमृतसर की तरफ रवाना किया।जहन खान ने अमृतसर पर हमला कर दिया।कई सिख लोग श्री हरीमंदर साहिब को बचाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन दुर्भाग्य से जहान खान ने गुरुद्वारा और इसके आसपास के भवनों को ध्वस्त कर दिया और हरमंदिर साहिब को मलबे से भर दिया।श्री हरिमंदिर  साहिब तब सभी सिखों के लिए बंद कर दिया गया था।इस समय, बाबा दीप सिंह जी दमदमा साहिब में थे। जब उनको हरमंदिर साहिब को  नुकसान पहुंचने का पता चला तो उनका खून खौल उठा। तो उन्होंने तत्काल अफगानों को निकालने और गुरुद्वारा पुनर्निर्माण के अपने इरादे की घोषणा की। उन्होंने इस मिशन को पूरा किए बिना ज़िन्दा वापस नहीं आने के लिए प्रतिज्ञा की, चाहे मेरा सर कट जाये पर सीखो पर आंच आने नहीं दूंगा।  तब बाबा  दीप सिंह जी उमर  ७५ वर्ष थी। लेकिन उनके पास अभी भी एक युवा योद्धा की ताकत थी। उन्होंने सिखों के एक बड़े समूह को इकट्ठा किया और हरीमंदिर  साहिब की ओर प्रस्थान किया। जब तक वे अमृतसर से दस मील की दूरी पर तेरन तरण  के गांव तक पहुंचे उनके साथ हजारो के संख्या में सिख जुड़ गए। जब बाबा दीप सिंह जी के इरादों की खबरें जहन खान तक पहुंच गईं, तो उसने  तुरंत 20,000 लोगों की सेना इकट्ठी की और तेरन तरण की तरफ बढ़ गया। बाबा दीप सिंह जी की सेना ने जहर खान की सेना को अमृतसर से लगभग पांच मील की दूरी पर गढ़वाल के गांव के पास पकड़ा, इस स्थान पर  दोनों पक्षों के बीच  संघर्ष हुवा। प्रत्येक सिख ऐसे महान वीरता और साहस से लड़ते थे कि दुश्मन लगभग हार गए थे। इसी युद्ध के दौरान जहन खान के मदत के लिए बड़ी संख्या में मुघल  सैनिक पहुंचे।संघर्ष के दौरान, मुगल कमांडरों में से एक, जमाल खान ने बाबा दीप सिंह जी पर हमला कर दिया इस लड़ाई में बाबा दीप सिंहजी का सर अपने शरीर से अलग हो गया।  इस दृश्य को देखने के बाद, एक युवा सिख योद्धा  बाबा जी के पास गया और उनको  श्री हरिमंद साहिब तक पहुंचने के लिए अपनी प्रतिज्ञा की याद दिलायी।यह सुनकर, बाबा दीप सिंह जी तुरंत खड़े हुए हाथ में अपने कटे सिर को पकड़ा और दूसरे हाथ से  फिर से लड़ाई करने लगे। जो भी शत्रु बिच में आया उसे बाबाने तलवार से काट डाला। बाबा का भयानक रूप देख कर मुग़ल सेना भाग खड़ी हुयी। बाबा दीप सिंह जी श्री हरी मंदिर साहिब पहुंचे और अपना सर हरमंदिर साहिब को चढ़ा दिया। आज भी, उनका जीवन सभी सिखों के लिए एक उदाहरण के रूप में कार्य करता है कि कैसे गरिमा के साथ जीना और मरना है।
अमृतसर के दर्शनीय स्थल 
अमृतसर यात्रा का youtube वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करे 


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