Thursday, February 8, 2018

Haridwar Visiting Places

हरिद्वार

हरिद्वार उत्तराखण्ड राज्य में स्थित है।हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ है।हरिद्वार को हरी का द्वार भी कहा जाता है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। गंगा नदी समुद्रतल से 3139 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गौमुख (गंगोत्री ) से 253 किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार के मैदानी क्षेत्रों में आती है, इसलिए हरिद्वार को गंगाद्वार के नाम से भी जाना जाता है।हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घड़े से गिर गयीं जब गरुड़ उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे।


हरिद्वार के दर्शनीय स्थल

हर की पौड़ी

यहाँ गंगाजी का बड़ा घाट है। हरिद्वार का यह मुख्य आकर्षण है। 'हर की पौड़ी' हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है। हर की पौरी को ब्रह्मकुंड भी कहा जाता है। इसी पर कुंभ का मेला लगता है। इस घाट के पहले गंगा पहाडिये से निचे आती दिखती है। यह एक विशाल कुंड है, जिसमें हमेशा कमर तक पानी रहता है।इस घाट में अस्थि विसर्जन और मुंडन कार्य किया जाता है।राजा विक्रमादित्य का भाई भिथारी तपस्या करने हरिद्वार में आए थे।उनको ये घाट बहुत प्रिय था। उनकी मृत्यु के पश्चात राजा विक्रमादित्य ने भाई भ्रिथारी की याद में यह घाट बनवाया था। यहाँ स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।यहां आनेवाले तीर्थ यात्री यहाँ से गंगाजल ले जाना नहीं भूलते, लोगो का विश्वास है कि यह गंगा जल हमेशा शुद्ध ही रहता है। प्रति वर्ष चैत्र में मेष संक्रांति के समय मेला लगता है। प्रति बारह वर्षों पर जब सूर्य और चंद्र मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में स्थित होते हैं तब यहां कुंभ का मेला लगता है। उसके छठे वर्ष अर्धकुंभ का मेला भी लगता है।देश विदेश से कई लाख यात्री आते है और गंगा में स्नान करते हैं।

गंगा की आरती

 हर की पौड़ी पर शाम के वक्त गंगा देवी की आरती तीर्थ यात्रियों का प्रमुख आकर्षण है। गंगा आरती देश ही नहीं विदेशों में भी लोकप्रिय है।

चंडी देवी मंदिर

 यह मंदिर हरिद्वार से 6 किमी पर गंगा नदी के पूर्वी किनारे पर नील पर्वत के शिखर पर स्थित हैै। मन्दिर चंडीघाट से 3 किमी दूरी पर स्थित है। चढ़ाई चढ़कर जाना होता है। जहां रोपवे द्वारा भी पहुंचा जा सकता है।रोपवे से जानके के लिए बहुत ज्यादा भीड़ होती है।यह मंदिर ५१ शक्ति पीठो में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार चंड- मुंड राक्षस को देवी चंडी ने यहीं मारा था जिसके बाद इस स्थान का नाम चंडी देवी पड़ गया। देवी की मुख्य प्रतिमा की स्थापना आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने की थी। माता चण्डी देवी के मंदिर के अतिरिक्त यहाँ संतोषी माता का मंदिर भी है।हनुमानजी और माता अंजना देवी का मंदिर भी बना हुआ है।

मनसा देवी मंदिर

हरिद्वार में शिवालिक श्रेणी के बिलवा पर्वत-शिखर पर मनसा देवी का मन्दिर स्थित है। हरिद्वार से ३ किमी की दुरी पर है। मनसा देवी भक्तो के मन की इच्छा पूरी करती है इस लिए यह देवी मनसा देवी नाम से जानी जाती है। मन्दिर में देवी की दो प्रतिमाएं हैं, पहली प्रतिमा तीन मुखों व पांच भुजाओं वाली है। दूसरी प्रतिमा आठ भुजाओं वाली है। भक्त अपनी इच्छा पूरी करने के लिए धागे बांध कर जाते हैं।इच्छा पूरी होने पर धागा खोलने के लिए फिरसे मंदिर जाना जरुरी माना जाता है। यहां पर भी आने जाने के लिए रोपवे बनाया गया है।पैदल मार्ग से भी जा सकते है। सामान्य चढ़ाई है।

माया देवी मन्दिर

हरिद्वार से आधा किमी की दूरी पर है।11वीं शताब्दी में बना यह माया देवी मन्दिर बनवाया गया था। ५१ शक्ति पीठ में से एक है। यहां देवी सती की नाभि और दिल गिरे थे।

वैष्णो देवी मन्दिर

हर की पैड़ी से करीब 1 किलोमीटर दूर वैष्णो देवी मंदिर स्तिथ है। यहाँ वैष्णो देवी का भव्य मंदिर बना हुआ है। जम्मू के वैष्णो देवी जैसे ही यह पहाड़ी पर स्थित है।एक गुफा में तीन पिंडियों के दर्शन होते है।
भारतमाता मन्दिर
वैष्णो देवी मन्दिर से कुछ दुरी पर भारतमाता मन्दिर है। इस मंदिर का निर्माण स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि के द्वारा किया गया है।इंदिरा गाँधी के द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर इस का लोकार्पण हुआ था। यह मंदिर ८ मंजिला है। ऊपर के मंजिल पर विष्णु मंदिर और शिव मंदिर है। इस मंदिर के विभिन्न मंजिलों पर शूर मंदिर, मातृ मंदिर, संत मंदिर, शक्ति मंदिर, और भारत दर्शन के रूप में मूर्तियों तथा चित्रों से भारत की बहुआयामी छवियों को दर्शाया गया है।

सप्तर्षि आश्रम

'भारत माता मंदिर' से आगे बढ़कर आसानी से सप्तर्षि आश्रम तक पहुँचा जा सकता है।यहाँ सात ऋषि एक साथ तपस्या करते थे।यहाँ मुख्य मंदिर शिवजी का है और सप्त ऋषियों के छोटे छोटे मंदिर दर्शनीय हैं। अखंड अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है। 
शान्तिकुंज/गायत्री शक्तिपीठ
गायत्री शक्तिपीठ को १९७१ में बनाया गया था। सुप्रसिद्ध मनीषी श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा स्थापित गायत्री परिवार का मुख्य केन्द्र है।यह गायत्री पीठ मुख्यत: श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित पुस्तकों तथा उनकी पत्रिकाओं के प्रकाशन का कार्य भी करता है।

पारद शिवलिंग

कनखल में श्रीहरिहर मंदिर के निकट ही पारद शिवलिंग का मंदिर है।यह शिवलिंग पारद से निर्मित है। इस पारद से बने शिवलिंग का वजन 151 किलो है। मंदिर के प्रांगण में रुद्राक्ष का एक विशाल पेड़ है जिस पर रुद्राक्ष के अनेक फल लगे रहते हैं। 


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