Saturday, February 24, 2018

Badrinath Dham yatra complete guide in hindi

How to plan a trip to Badrinath

बद्रीनाथ यात्रा का प्लानिंग कैसे करे 

बद्रीनाथ यात्रा की शुरुवात  - हरिद्वार या ऋषिकेश से करे
हरिद्वार से बद्रीनाथ की दुरी  - ३२४ की मी    
बद्रीनाथ कैसे पहुंचे  - हरिद्वार रेल्वे स्टेशन के सामने बस स्टैंड है वहासे बद्रीनाथ जाने वाली बस मिलती है।  किराये की कार भी मिलती है।   
बद्रीनाथ यात्रा के लिये कितने दिन की होगी  -  हरिद्वार से बद्रीनाथ से  हरिद्वार ४ दिन 
रूम कहाँ बुक करे - जाते समय हरिद्वार में १ दिन ,बद्रीनाथ में २ दिन,बद्रीनाथ से आते समय हरिद्वार में १ दिन.  सभी जगह GMVN के यात्री निवास बने है।GMVN के  वेब साइट www.gmvnl.in पर जाकर  ऑनलाइन एडवांस में रूम बुक कर सकते है। 

Date of opening and closing of the Badrinath kapat

बद्रीनाथ के कपाट खुलने और बंद होने की तिथि 

बद्रीनाथ के कपाट ६ माह खुले रहते है और ६ माह बंद रहते है। प्रति वर्ष बद्रीनाथ मंदिर के कपाट खुलने और बंद करने  कि तिथि का एलान  बसंत पंचमी के दिन  मंदिर समिति  द्वारा  की जाती है।
कपाट खुलने की तिथि - अक्षय तृतीया को कपाट खुलने की परंपरा है l
कपट बंद होने की तिथि - मार्गशीर्ष माह के प्रथम सप्ताह (दीपावली के बाद) में ही कपाट बंद होने की परंपरा है l

बद्रीनाथ जी के कपाट  बंद होने की कार्य पद्धति -

बद्रीनाथ के कपाट बंद होने का कार्य  तिथि से पांच दिन पूर्व ही शुरू हो जाता है। सबसे पहले मंदिर परिसर में स्थित गणेश मंदिर के कपाट बंद करदिये जाते है। दूसरे दिन केदारेश्वर के कपाट बंद किये जाते है। तीसरे दिन वेद मंत्रो के ग्रंथ बंद किये जाते है। चौथे दिन लक्ष्मी माता को गर्भ गृह में श्री बद्रीनाथ जी के साथ विराजमान किया जाता है और गर्भ गृह में विराजमान श्री उद्धवजी और कुबेरजी की चल उत्सव मुर्तिया को  आद्य गुरु शंकराचार्य की गद्दी के साथ पाण्डुकेश्वर लाया जाता है। पाण्डुकेश्वर बद्री मंदिर के गर्भ गृह में श्री उद्धव जी और कुबेर जी की मुर्तिया विधि विधान से पुनः स्थापित की जाती है। ६ माह बद्रीनाथजी के कपाट बंद रहने तक बद्रीनाथ की पूजा पाण्डुकेश्वर में की जाती है। आदि शंकराचार्य गद्दी को जोशीमठ में नृसिंह मंदिर में लाया जाता है।  पांचवे आखरी दिन पुरे विधि विधान से पूजा करके घृत कम्बल से भगवान बद्रीनाथ जी और  लक्ष्मी माता को ढका जाता है और अखंड दिप प्रजोलित किया जाता है।  कपाट ६ महीनो के लिये बंद कर दिये जाते है। इस  ६ माह की कार्यकाल में गर्भ गृह में केवल बद्रीनाथ जी और  लक्ष्मी माता की मुर्तिया रहती है। 

बद्रीनाथ जी के कपाट  खुलने  की कार्य पद्धति -

अक्षय तृतीया के दिन कपाट खोले जाते है। इस दिन श्री उद्धव जी और कुबेरजी की चल उत्सव मूर्तियों को वापस बद्रीनाथ मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित किया जाता है।जोशी मठ से शंकराचार्य की गद्दी वापस लाई जाती है। रावल जी द्वारा पुरे विधि विधान से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ कपट खोला जाता है। बद्रीनाथजी और  लक्ष्मी माता के मूर्ति पर ओढाया गया घृत कम्बल हटाया जाता है। लक्ष्मी माता की मूर्ति उनके मंदिर में पुनः स्थापित की जाती है। ६ महीने के बाद भी गर्भ गृह में प्रज्वलित ज्योत निरंतर प्रज्वलित रहती है। जबकि इस अवधि में बद्रीनाथ धाम बर्फ से ढका रहता है। ऐसी स्थिति में ज्योति का निरंतर प्रज्वलित रहना बद्रीनाथ जी का चमत्कार माना जाता है।     

बद्रीनाथ के पुजारी

भगवान बद्रीनारायण की पूजा अर्चना के मुख्य पुजारी सिर्फ़ केरल के  नंबूदरीपाद ब्राह्मण ही होते है।  दक्षिण भारत के पुजारी को नियुक्त करने की ये परंपरा शंकराचार्य ने डाली थी जो आज तक चली आ रही है।
आदि शंकराचार्य ने भारत की  जिन चार धामों की स्थापना की थी बद्रीनाथ उनमें से एक हैं। पुजारी वेद-वेदांग विद्यालय का स्नातक और कम से कम शास्त्री की उपाधि प्राप्त होनी चाहिए। वह  ब्रह्मचारी भी होना चाहिए।पुजारी को रावल कहा जाता है। नये रावल की नियुक्ति करते वक्त  त्रावणकोर के राजा की सहमति भी ली जाती है। बद्रीनाथ के कपाट  बंद होते ही  रावल वापस अपने घर केरल चले जाते हैं और कपाट खुलने की तिथि आते ही वापस बद्रीनाथ आ जाते हैं।

बद्रीनाथ धाम की पंच शिला

बद्रीनाथ में अलकनदा नदी के किनारे तप्त कुंड के नजदीक पांच शिलाये  बनी है।

गरुड़ शिला

 जिस प्रकार शिवजी के मंदिर में नंदी को नमन किये बिना शिवजी के दर्शन और पूजा सफल नहीं होती।उसी प्रकार गरुड़ शिला के दर्शन के बिना बद्रीनाथ के दर्शन पूर्ण नहीं होते। गरुड़ श्री विष्णु भगवान के वाहन है। गरुड़ ने इस शिलापर बैठकर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। विष्णु भगवान गरुड़ की तपस्या से प्रसन्न हो गए और गरुड़ को मन चाहा वरदान  मांगने को कहा।गरुड़जी ने वरदान माँगा यह शिला गरुड़ शिला के नाम से प्रसिद्ध हो और इस शिला का स्मरण चिंतन करने  वाले मनुष्य के समस्त व्याधियों  और पापो का निवारण हो। तभी से यह शिला गरुड़ शिला के नाम से प्रसिद्ध हुई है।

नारद शिला

तप्त कुंड के नजदीक ही नारद शिला और नारद कुंड  स्थित है। इस शिला पर बैठकर नारदजी ने श्री विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए ६० हजार वर्ष तक तप किया था।नारदजी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान अपने चतुर्भुज रूप में नारदजी के सामने प्रकट हो गए और नारदजी को वरदान मांगने को कहा। नारदजी ने वर माँगा भगवान मेरे शिला के समीप आप की उपस्थिति सदा महसूस हो और जो मेरी शिला का दर्शन करेगा और मेरे तीर्थ में स्नान करेगा उसे मनुष्य योनि फिर से प्राप्त हो।भगवान विष्णु की वर्तमान मंदिर में स्थित मूर्ति नारद कुंड से निकालकर मंदिर में स्थापित की गई  है।

मार्कण्डेय शिला

नारद शिला के नजदीक ही मार्कण्डेय शिला है। पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि मार्कण्डेय ने इस स्थान पर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय: नम: मन्त्र का जाप कर घोर तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर महर्षि मार्कण्डेय को  अल्पायु से मुक्त किया और उन्हें कई कल्पो की दीर्घायु प्रदान की। बीमार व्यक्ति को    मार्कण्डेय शिला का दर्शन करना चाहिये। 

नरसिंह शिला

यह शिला अलकनंदा नदी दे बिच स्थित है।नरसिंह भगवान द्वारा  हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद भगवान का क्रोध शांत नहीं हुवा तब भक्त प्रल्हाद की प्रार्थना पर नरसिंह भगवान बद्रिकाधाम में चले आये। बद्रीधाम में अलकनंदा नदी में स्नान करने से उनका क्रोध शांत हो गया। ऋषि मुनियो के प्रार्थना पर नरसिंह भगवान शिला के रूप में अलकनन्दा नदी के मध्य में बस गये। इस शिला का दर्शन करने से संकट दूर होते है और दिव्य फलो की प्राप्ति होती है।

बाराही (वराह )शिला    

अलकनंदा जी के जल में एक शिला है। पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल ले गये थे तब भगवान नारायण ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष दैत्य का वध कर पृथ्वी को मुक्त किया।वराह अवतार का कार्य समाप्त करने के बाद। भगवान का यह वराह अवतार बद्रीनाथ में आकर शांत हो गया। बाराही  शिला के पूजन से प्रेत बाधांए दूर होती है।   

Mythological story of Badrinath

बद्रीनाथ की पौराणिक कहानी

 एक ऋषि ने भगवान विष्णु को श्राप  दिया था। ऋषि  के श्राप से मुक्ति पाने के लिए  भगवान् विष्णु  तपस्या करने के लिये अच्छे स्थल की  खोज  में थे। उनकी नजर बदरी वन पर पड़ी। बदरी वन भगवान विष्णु को बहुत पसंद आया और वह यंहा आये। पद्मासन अवस्था में तपस्या में लीन हो गये,तभी बदरी वन में भारी हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु  हिम से ढक गये उनकी इस दशा देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा विष्णु भगवान के नजदीक खड़े होकर विशाल बेर (बदरी ) के वृक्ष का रूप धारण कर लिया और हिम को  अपने ऊपर झेलने लगी। इसलिए इस क्षेत्र का नाम पड़ा बदरी विशाल और भगवान नारायण के साथ जुड़ने से यह बदरीनाथ धाम के नाम से विख्यात हुआ l

शिवजी से श्री विष्णु जी द्वारा बद्रीनाथ स्थान हासिल करने की कथा

नीलकंठ पर्वत पर पहले शिवजी पार्वती माता के साथ निवास करते थे। श्री विष्णु जी तपस्या के लिए अच्छे स्थान के तलाश में थे। अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान उन्हें  बहुत ही पसंद आया।श्री विष्णुजी बालक का रूप धारण कर के चरणपादुका स्थान पर प्रकट हुए और रुदन करने लगे ।बालक का रुदन सुनकर पार्वती माता का ह्रदय द्रवित हो उठा। पार्वती माता और शिवजी बालक के समक्ष प्रगट हुये। माता ने पूछा बालक क्यों रुदन कर रहे हो तुम्हे कुछ चाहिए क्या ?तुम मांगोगे वह मै तुम्हे दूंगी।बालक ने अलकनंदा नदी का स्थान मांग लिया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने तपस्या हेतु बालक रूप धारण कर यह स्थान शिवजी से प्राप्त कर लिया। इसी स्थान को आज हम बद्रीविशाल के नाम से जानते है। 




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