Thursday, January 11, 2018

Konark Sun temple

कोणार्क सूर्य मंदिर कैसे जाये

How to reach konark sun temple

जगन्नाथ पूरी से कोणार्क सूर्य मंदिर की दुरी  :- ३५ कि.मी.
जगन्नाथ पुरे से कोणार्क जाने के लिए OTDC  की बसे पथनिवास  होटल से मिल जाती है। बहुत सारी प्राइवेट बसे ,कार मिल जाती है।
भुवनेस्वर से कोणार्क सूर्य मंदिर की  दुरी :-  ६७ कि.मी.
भुवनेश्वर से कोणार्क जाने की लिए OTDC  की बसे या प्राइवेट बसे ,कार मिलजाती है।

कोणार्क सूर्य मंदिर के बारे में 

About Konark sun temple

कोणार्क सूर्य मंदिर उड़ीसा के पूरी जिले में कोणार्क में स्थित है। पूर्व गंग वंश के राजा नृसिंहदेव ने १२३६-१२६४ ई.पूर्व में इस मंदिर को  बनवाया था। इस मंदिर को १९८४ में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोसित किया गया है।

सूर्य मंदिर की पौराणिक कहानी 

Legendary story of Sun Temple

श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब को श्राप से कृष्ट रोग हो गया था। कृष्ट रोग से मुक्ति पाने के लिए साम्ब  ने चंद्रभागा नदी के समुद्र संगम पर, कोणार्क में सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए बारह वर्षो तक तपस्या की और सूर्य भगवान को प्रसन्न किया था। सूर्यदेव ने साम्ब के कृष्ट रोग का निवारण किया। रोग निवारण के बाद साम्ब चंद्रभागा नदी में स्नान के लिए गए तभी चंद्रभागा नदी में उन्हें सूर्य देव की मूर्ति मिली,इस मूर्ति को मित्रवन (कोणार्क)में एक मंदिर बनाकर उसमे स्थापित कर दी। 

कोणार्क सूर्य मंदिर १२ का  अजूबा :-

सूर्य मंदिर निर्माण के लिए १२ वर्ष लगे। १२ हजार शिल्पकारों ने इसे बनाया।मंदिर १२ एकर में फैला है।मंदिर निर्माण में राज्य का  १२ वर्षो का धन खर्च हुवा।

कोणार्क सूर्य मंदिर में पूजा क्यों नहीं होती ?

कोणार्क मंदिर में पूजा न होने की कहानी इस प्रकार बताई जाती है। राजा नृसिंहदेव ने मंदिर निर्माण की समय सिमा १२ वर्ष तय कर दी थी अगर शिल्पकार १२ वर्ष में मंदिर का निर्माण पूरा नहीं कर पाये तो उन्हें मृत्यु दंड मिलने वाला था। सभी मंदिर का निर्माण १२ वर्ष के आखरी दिन तक पूरा हो गया शिवाय चुंबक के पत्थर को शिखर पर लगाने के। सभी चिंता में पड़ गए अगर आज शिखर पर चुंबक नहीं लगा तो राजा  के द्वारा सभी १२ हजार  कामगारों को मृत्यदंड मिलना तय था। उतने में मुख्य वास्तुकार का १२ साल का बेटा वहां आया उसने परेशानी का कारन जाना। रात में सभी के सोने के बाद उसने चुंबक वाला पत्थर शिखर पर लगा दिया। मगर राजा की शर्त ये थी की मंदिर के निर्माण में १२ हजार कामगार ही काम कर सकते थे। वास्तुकार के बेटे ने शिखर पर पत्थर को लगाने का कार्य किया इसलिए  कामगार बढ़कर १२ हजार एक हो गए। सभी की जान बचाने  के लिए उस बच्चे ने मंदिर के शिखर पर चढ़कर समुद्र  में  कूद कर जान दे दी। तब समुद्र के किनारे मंदिर का निर्माण किया गया था। समुद्र धीरे धीरे सुख मंदिर से  दूर होता गया।वास्तुकार के बेटे ने मंदिर के शिखर से कूदकर आत्महत्या करने की घटना को अशुभ माना गया तभी से आज तक इस मंदिर में कभी पूजा की नहीं गई।       

कोणार्क सूर्य मंदिर क्षतिग्रत होने के कारण :-

कोणार्क सूर्य मंदिर समय से पहले टूटने के अनेक कारन बताये जाते है। उसमे से निम्न कारन प्रमुख है। 
सूर्य मंदिर पर कालापहाड़ का कहर :-
कालापहाड़ मुस्लिम आक्रमणकारी था। कालापहाड़ ने सन १५०८ में उड़ीसा पर आक्रमण किया था। उसने कोणार्क सूर्य मंदिर समेत बाकि मंदिर भी नष्ट कर दिये। वर्तमान सूर्य मंदिर उसीका नतीजा है।
वास्तु कला के विपरीत निर्माण
इस मंदिर का निर्माण वास्तु कला व् नियमो के विरुद्ध किया  गया था इस कारणवश समय से पहले धराशायी हो गया।
शिखर पर लगा चुम्बकीय पत्थर :-
सूर्य मंदिर के शिखर पर एक चुम्बकीय पत्थर लगाया गया था। समुद्र से गुजरने वाले पोर्तुगीज और डाकुओ के जहाज चुंबक  के कारन मंदिर की और  खिंचे चले आते थे। जहाज को भारी  क्षति पहुँचती थी। जहाज को दिशा दिखाने वाला निरूपण यंत्र जहाजों को सही दिशा नहीं दिखाते थे। जहाज़ दिशा से भटक जाते थे और चट्टानों से टकराकर दुर्घटना ग्रस्त हो जाते थे। इसलिए समुद्री डाकू या पोर्तुगीज इस चुम्बकीय पत्थर को  निकाल कर अपने साथ ले गये।चुम्बकीय पत्थर के कारन मंदिर का संतुलन बना था। पत्थर को निकालते ते ही दीवारों का संतुलन बिघड गया और मंदिर धराशाही हो गया।

सूर्य मंदिर की वास्तु कला

कोणार्क मंदिर के निर्माण में लाल रंग के बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है और  कलिंग शैली में निर्माण किया गया। यह मंदिर सूर्य देव को समर्पित है। रथ के विशाल आकर में इस मंदिर को बनवाया गया है।  मंदिर को बारह जोड़ी पहिये और सात घोड़े खींचते हुये बनवाया गया है।सात घोड़े मेसे अभी एक ही घोडा बचा है। पहियों के जरिये सही समय को पता किया जाता है इस लिए इन्हे धुप घड़ी भी कहा जाता है।इस मंदिर में तीन मंडप का निर्माण किया गया  है।नृत्य मंडप ,जगमोहन (सभामंडप),  गर्भगृह। नृत्य मंडप का छत गिर चूका है।गर्भगृह पूरी तरह क्षति ग्रस्त हो चूका है। जगमोहन मंदिर ही सुस्थिति में बचा है। इसे भी अग्रेजो द्वारा  १९०३ में रेत भर कर बंद कर दिया ताकि मंदिर सुरक्षित रहे। मुख्य गर्भगृह की उचाई २२९ फिट थी और  जगमोहन मंडप की १२८ फिट लंबा है । इस मंदिर के दीवारों पर बाल अवस्था से लेकर प्रौढ़ अवस्था तक मनुष्यो के जीवनकाल को बहुत ही सुंदरता पूर्वक शिल्पाकृतियों में दर्शाया गया है।अनेको देवताओ,गंधर्वों ,प्रेमी युगल ,दरबार ,शिकार , युद्ध के शिल्पो का निर्माण दीवारों पर किया गया है। मंदिर के बहुत सारे  शिल्प कामसूत्र पर आधारित है।        
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